भारत में सामान नागरिक संहिता की फ़िलहाल ना जरुरत है और न ही वांछनीय है. इसके बजे विधि आयोग ने हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई व पारसी पर्सनल लों में संशोधन कर लैंगिक असमानता ख़त्म करने की सिफारिश की है.
भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान समान नागरिक संहिता लेन का वादा किया था. जुलाई 2016 में कानून मंत्रालय ने विधि अयोग को समान नागरिक संहिता की व्यवहारिकता और गुंजाईश पर अध्ययन करने को कहा था. न्यायमूर्ति बी एस चौहान की अध्यक्षता वाले आयोग ने कानून मंत्रालय को दिए पत्र में कहा की समान नागरिक संहिता की अभी जरूरत नहीं है.
पब्लिक पोलिटिकल पार्टी (पपोपा) ने भाजपा पर आरोप लगाया है की भाजपा जहाँ एक तरफ समान नागरिक संहिता लाने का अव्यवहारिक दिखावा कर रही है वहीँ सवर्णों और अवर्णों के मध्य अधिकाधिक असमानता पैदा करना चाहती है. अभी तक भाजपा ने जितनी भी योजनाये बनाई हैं वे सभी सवर्णों से छीनकर अवर्णों को देने के उद्देश्य से बनाई गयी हैं. पब्लिक पोलिटिकल पार्टी सत्ता में आने पर भारत के सभी नागरिकों को एक समान रूप से देखेगी और जाति धर्म के नाम पर होने वाले नस्लवाद को समाप्त करेगी.
सवर्णों ने ठाना है, पपोपा सरकार बनाना है …
