देरी से न्याय का होना न्याय नहीं अन्याय की तरह होता है इस फ़ैसले ने यही साबित किया है : श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव

कानपुर (यूपी)
बहुचर्चित बेहमई कांड में 43 साल बाद बुधवार को जो फ़ैसला आया है उसकी स्थिति ये है कि इसमें न्यायालय ने ज़िंदा बचे एक आरोपी को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है और एक को साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त कर दिया है। अब इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जिस तारीख़ को बेहमई में घटना हुई थी 43 साल बाद उसी तारीख़ को फैसला आया है। इस घटना में कुल 36 लोगों को आरोपी बनाया गया था।
देशहित और सवर्णों की पब्लिक पोलिटिकल पार्टी ने इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि किसी मामले में फ़ैसला आने में अगर 43 वर्ष लगते हैं तो ऐसे न्याय का होना क्या अर्थ रखता है। ये तो न्याय के नाम पर अन्याय होने जैसा है।
पब्लिक पोलिटिकल पार्टी के फाउंडर लोकेश शितांशु और राष्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव ने इस पर संयुक्त वक्तव्य में कहा है कि ये क्या है- और कैसा फ़ैसला है, हम इस पर अपनी असहमति प्रकट करते हैं। ये इस बात पर ही मोहर लगाता है कि देरी से न्याय मिलना न्याय नहीं अन्याय की तरह होता है इस फ़ैसले ने यही साबित किया है। 43 वर्ष के बाद अब इसकी क्या सार्थकता रह गई है। और क्या न्याय है -? अब इस फ़ैसले का कोई अर्थ नहीं रह जाता है जब 36 दोषियों में से अधिकांश रहे ही नहीं हैं।

ज्ञात रहे कि 14 फरवरी 1981 को बेहमई में नरसंहार हुआ था जिसमें डकैत फूलन देवी ने लाइन में खड़ा कर 20 लोगों को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया था। पांच लोग घायल हुए थे। इस घटना में डकैत फूलन व उसके गिरोह के 36 लोगों को आरोपी बनाया गया था और अब जब इस केस में फूलन देवी सहित 31 आरोपी मर चुके हैं और एक आरोपी मान सिंह अभी तक फरार है। पुलिस उसे नहीं ढूंढ पाई है। तब 43 वर्ष बाद एंटी डकैती कोर्ट ने बेहमई कांड के आरोपी श्यामबाबू को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई है और एक आरोपी विश्वनाथ को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया है।
श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव ने फ़ैसले पर आश्चर्य प्रकट करते हुए बताया कि हद हो गई है 43 वर्ष बाद फ़ैसले का आना बिल्कुल निरर्थक हो गया है और यह अब न्याय के नाम पर अन्याय के समान ही है।‌ पब्लिक पोलिटिकल पार्टी ऐसे देर से आए न्याय को न्याय नहीं मानती।
श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव ने बेहमई कांड के बारे में बताया कि यमुना बीहड़ पट्टी में बसे इस गांव के लोगों पर फूलन को शक था कि वह ठाकुर बिरादरी के लालाराम व श्रीराम गिरोह को पनाह देते हैं। इस गिरोह से फूलन का गैंगवार चल रहा था। फूलन ने गांव के लोगों को कई बार चेतावनी दी इसके बाद 14 फरवरी 1981 की दोपहर फूलन अपने गिरोह के साथ गांव पहुंची और उसने 25 लोगों को गांव के बाहर एक कुएं के पास लाइन में खड़ा करके गोलियों से भून दिया। इस घटना के बाद गांव में इतनी दहशत हो गई कि कोई रिपोर्ट लिखाने को तैयार नहीं था। तब गांव के राजाराम सिंह आगे आए और इन्होंने रिपोर्ट दर्ज कराई। दरअलसल राजाराम के बेटे व परिवार के कई लोग मारे गए थे। इस घटना से यूपी सरकार तक हिल गई थी। अब 43 वर्ष बाद इसका फ़ैसला आया है। जब अधिकांश मुजरिम बाहर चैन की सांस लेते हुए दुनिया से ही चले गए तब आए फ़ैसले ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है।

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