2017 में मोदी सरकार ने नौकरियों में सबसे अधिक कटौती की. शीतकालीन सत्र के दौरान राज्यसभा में कार्मिक राज्य मंत्री ने एक लिखित जवाब में बताया की वर्ष 2016-17 में कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी), संघ लोकसेवा आयोग (यूपीएससी) और रेलवे भर्ती बोर्ड द्वारा भरी जाने वाले पदों में सन 2014-15 के मुकाबले साढ़े बारह हजार से भी अधिक की कमी आई है. 2017 के बजट सत्र में भी कार्मिक राज्यमंत्री ने लोकसभा में बताया था की वर्ष 2015 में हुई केंद्र सरकार की सीधी भर्तियाँ 2013 के मुकाबले 89% कम थी. इसी सत्र में मोदी सरकार ने 80 हजार नौकरियों के लिए बजट बनाने की बात बताई थी जो फर्जी निकली.

संगठित निजी क्षेत्र के हालत और भी ख़राब हैं. बाम्बे स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड देश की शीर्ष कंपनियों में नए कर्मचारियों की संख्या 2015-16 में 123000 थी 2016-17 में मोदीमंदी से यह 66000 तक पहुँच गई है. राजगार विरोधी भाजपा सरकार के कारण यह स्थिति हुई है.

2017 में पूरे देश में 122 इंजिनीयरिंग कॉलेज बंद हो गए, आई आई टी एवं आई आई एम में लगभग 6000 सीटें खाली रही.

मोदी सरकार का कुतर्क है की उसने सीधी भर्तियों की जगह रोज़गार के मौके उपलब्ध कराये. स्टार्टअप इण्डिया या मुद्रा योजना के अंतर्गत प्राप्त ऋण की दर 11.25% से 11.75% दर है जो की बाजार से बहुत अधिक है.

इस समय देश में लगभग 12 करोड़ लोग बेरोजगार हैं. यदि गलती से 2019 में भाजपा फिर से केंद्र में आ गई तो भगवान जाने बेरोजगारों का क्या होगा?

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