ये सरासर अनुचित और अमानवीय है : श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव

नई दिल्ली।

देशहित और सवर्ण समाज की पब्लिक पोलिटिकल पार्टी ने देश की सबसे बड़ी अदालत यानि सुप्रीम कोर्ट में उठे एससी-एसटी आरक्षण में उपवर्गीकरण के मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे अनुचित करार दिया है, साथ ही इसकी आलोचना भी की है कि सरकारी नौकरियों और एजुकेशन में सामान्य वर्ग के या आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों के लिए कोई प्रावधान या व्यवस्था नहीं की गई है। जबकि इसके उलट एससी-एसटी और ओबीसी आरक्षण को लगातार बढ़ाया जाता रहा है।
पब्लिक पोलिटिकल पार्टी की ओर से जारी राष्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव के बयान के अनुसार आरक्षण पर आरक्षण दिया जाना और एससी- एसटी तथा ओबीसी के आरक्षण की लिमिट को बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट तक की सीमा रेखा को लांघ जाना सरासर ग़लत है‌। उन्होंने बताया कि अभी फिलहाल ही में सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की संविधान पीठ ने कहा है कि राज्य सरकारें पिछड़े वर्गों को आरक्षण का लाभ देने में चयनात्मक नहीं हो सकती हैं क्योंकि इससे तुष्टिकरण की ख़तरनाक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा। संविधान पीठ ने कहा है कि सबसे पिछड़े वर्गों को आरक्षण का लाभ देते समय, राज्य सरकार दूसरों को बाहर नहीं कर सकती है। उच्चतम न्यायालय ने उस कानूनी सवाल पर अपना आदेश सुरक्षित रखा कि क्या राज्य सरकार को आरक्षण के लिहाज से अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) में जातियों के उपवर्गीकरण का अधिकार है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सभी अधिवक्ताओं की दलीलें सुनीं हैं जिसमें ईवी चिन्नैया फैसले की समीक्षा की मांग की गई है। ईवी चिन्नैया के फैसले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि एससी – एसटी आरक्षण में राज्य सरकार को उपवर्गीकरण करने का अधिकार नहीं है। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय में कुल 23 याचिकाएं लंबित हैं जिनमें एससी-एसटी आरक्षण में उप वर्गीकरण का मुद्दा उठाया गया है। ज्ञात रहे कि अदालत में मामला पंजाब का है। जिसमें पंजाब सरकार 2006 में पंजाब अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग यानि सेवाओं में आरक्षण का कानून 2006 लायी थी। इस कानून में पंजाब में एससी वर्ग को मिलने वाले कुल आरक्षण में से 50 प्रतिशत सीटें और पहली प्राथमिकता वाल्मीकि और मज़हबियों (मज़हबी सिक्ख) के लिए तय कर दी गईं थीं।
हाईकोर्ट ने 2010 में पंजाब के इस कानून को असंवैधानिक ठहरा दिया था जिसके ख़िलाफ़ पंजाब सरकार की सुप्रीम कोर्ट में अपील है। सात न्यायाधीश इस मामले को इसलिए सुन रहे हैं, क्योंकि 2004 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश मामले में दिए फैसले में कहा था कि राज्य सरकार को अनुसूचित जातियों के वर्गीकरण का अधिकार नहीं है। प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, विक्रमनाथ, बेला एम त्रिवेदी, पंकज मित्तल, मनोज मिश्रा और सतीश चंद्र शर्मा की सात सदस्यीय पीठ ने कई दिन तक सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत में बहस के दौरान पंजाब सरकार की ओर से अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग में ज़्यादा पिछड़े, ज़्यादा ज़रूरतमंदों को आरक्षण का लाभ देने के लिए एससी वर्ग के उपवर्गीकरण को सही ठहराया गया है। केंद्र ने भी इस उपवर्गीकरण को सही कहा है लेकिन पब्लिक पोलिटिकल पार्टी और उसकी राष्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव ने इसकी आलोचना और इसका विरोध किया है। पब्लिक पोलिटिकल पार्टी एससी-एसटी वर्ग के उपवर्गीकरण का विरोध करती है। क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14 यानि समानता के विरुद्ध है।
चीफ जस्टिस महोदय ने कहा है कि हम सिर्फ़ वाल्मीकियों का उदाहरण दे रहे हैं स्थिति इससे उलट भी हो सकती है। कहने का अर्थ यह है कि जिन लोगों को बाहर रखा गया है वह अपने वर्गीकरण को अनुच्छेद 14 में समानता के आधार पर चुनौती दे सकते हैं, लेकिन राज्य जवाब में कह सकता है कि हम पिछड़ेपन के विस्तार को देखकर जाति का वर्गीकरण कर सकते हैं।
अदालत के चीफ जस्टिस ने ये भी कहा है कि सबसे पिछड़ों को लाभ देना चाहते हैं, लेकिन सबसे पिछड़ों को लाभ देकर आप यह नहीं कर सकते कि जो सबसे पिछड़े हैं उनमें से कुछ को ही लाभ दिया जाए और अन्य को छोड़ दिया जाए। अन्यथा यह तुष्टीकरण की एक ख़तरनाक प्रवृत्ति बन जाती है। ऐसे तो कुछ राज्य कुछ जातियों को चुनेंगे, अन्य दूसरी जाति को चुनेंगे और फिर इस पर जमकर राजनीति होने लगेगी। चीफ जस्टिस ने कहा कि भले ही हम आपकी व्यापक दलील को स्वीकार न करें, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि आप लोग जो दलीलें दे रहे हैं उसमें कुछ तथ्य हैं और हमें एक मानदंड निर्धारित करके इसे तैयार करना होगा।
कुल मिलाकर तात्पर्य यह है कि सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने ये सवाल खड़ा किया है कि पिछड़ी जातियों में मौजूद संपन्न उपजातियों को आरक्षण की सूची से ‘बाहर’ क्यों नहीं किया जाना चाहिए और वो सामान्य वर्ग में प्रतिस्पर्धा करें। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात जजों की पीठ में शामिल जस्टिस विक्रमनाथ ने पूछा है कि इन्हें आरक्षण सूची से निकाला क्यों नहीं जाना चाहिए?’ उन्होंने कहा कि इनमें से कुछ उप-जातियों ने बेहतर किया है और संपन्नता बढ़ी है उन्हें आरक्षण से बाहर आना चाहिए और सामान्य वर्ग में प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। जस्टिस नाथ ने कहा है कि ये संपन्न उप-जातियां आरक्षण के दायरे से बाहर निकलकर उन उप-जातियों के लिए अधिक जगह बना सकती हैं जो अधिक हाशिये पर या बेहद पिछड़ी हुई हैं। बेंच में शामिल जस्टिस बीआर गवई ने कहा है कि एक व्यक्ति जब आईएएस या आईपीएस बन जाता है तो उसके बच्चे गांव में रहने वाले उसके समूह की तरह असुविधा का सामना नहीं करते हैं। फिर भी उनके परिवार को पीढ़ियों तक आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा क्या -? उन्होंने कहा कि ये संसद को तय करना है कि ‘ताक़तवर और प्रभावी’ समूह को आरक्षण की सूची से बाहर करना चाहिए या नहीं‌-?
पब्लिक पोलिटिकल पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती दीपमाला श्रीवास्तव ने सुप्रीम कोर्ट के इस मामले में अपना तर्क देते हुए कहा कि पिछड़ी जातियों के लिए सीट आरक्षित करने के लिए निश्चित रूप से अगड़ी जातियों को बाहर किया गया था और अगड़ी जातियों यानि सवर्ण जातियों को उसका ख़मियाज़ा भुगतना पड़ा है। और अब आरक्षण कम न करके, उसको पाने वालों की संख्या बढ़ाने का जो प्रयास किया जा रहा है यह किसी भी तरह से उचित या न्यायिक नहीं है।

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